बहुचर्चित सिकिदिरी हाइडल प्रोजेक्ट (स्वर्णरेखा जल विद्युत परियोजना) में हुए 20.87 करोड़ की वित्तीय अनियमितता में झारखंड राज्य बिजली बोर्ड (जेएसईबी) के तत्कालीन अध्यक्ष शिवेंद्र नाथ वर्मा (एसएन वर्मा) की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सीबीआई की विशेष अदालत ने उनपर आरोप तय कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का लगा स्टे रद्द होने के करीब छह माह बाद आईपीसी की धाराओं और भ्रष्टाचार की धाराओं के तहत आरोप तय किया गया। इस मामले में गवाही और साक्ष्यों की प्रस्तुति के लिए 30 नवंबर की तारीख मुकर्रर की गई है।
बता दें कि सीबीआई ने तीन जून 2016 को एसएन वर्मा समेत अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। जांच पूरी कर सीबीआई ने सितंबर 2020 में चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट पर कोर्ट ने संज्ञान लिया। संज्ञान के खिलाफ वर्मा हाईकोर्ट गए। वहां राहत नहीं मिली तब सुप्रीम कोर्ट गए, जहां बिना अभियोजन स्वीकृति आदेश के संज्ञान लेने के निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया था। स्वीकृति के बाद कोर्ट ने पुन: संज्ञान लिया। करीब 14-15 साल पुराने घोटाले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मामले में नया मोड़ आ गया है।
आरोप है कि तत्कालीन जेएसईबी अध्यक्ष एसएन वर्मा ने दरों की उचित जांच कराए बिना प्रस्ताव को मंजूरी दी। तत्कालीन सदस्य (वित्त) आलोक शरण के साथ मिलकर बीएचईएल को 20 प्रतिशत ब्याजमुक्त अग्रिम भुगतान देने पर सहमति जताने का भी आरोप है। सीबीआई ने मामले में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत कार्रवाई की है।
सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान पर विचार करने की दी थी छूट
22 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने एसएन वर्मा के खिलाफ पहले लिए गए संज्ञान को निरस्त कर दिया था। सीबीआई को अभियोजन स्वीकृति दाखिल करने और सक्षम अदालत से नए सिरे से संज्ञान पर विचार कराने की छूट दी गई थी। विशेष सीबीआई अदालत ने अभियोजन स्वीकृति और अन्य दस्तावेजों की समीक्षा के बाद एसएन वर्मा के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला पाते हुए उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए 24 मार्च 2026 को समन जारी किया था। नवंबर से सीबीआई इस मामले में गवाह और साक्ष्य पेश करेगी।
क्या है पूरा मामला
सीबीआई के अनुसार, साल 2011-12 में जेएसईबी के अधिकारियों ने भेल और एनपीईएल के साथ मिलकर आपराधिक साजिश रची। जिस मरम्मत कार्य का अनुमानित बजट महज 2.5 करोड़ रुपए था। उस नियम को ताक पर रखकर 20.87 करोड़ रुपए में भेल को आवंटित कर दिया गया। एसएन वर्मा पर आरोप है कि उन्होंने दर की तर्कसंगतता की जांच किए बिना और बोर्ड के अन्य इंजीनियरों के अनुमान (4.88 करोड़) को दरकिनार कर ऊंची दरों पर मंजूरी दी। साथ ही, बिना बैंक गारंटी के 20 फीसदी अग्रिम भुगतान का भी आदेश दे दिया। इससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा।

