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    300 साल पुराना झारखंड का श्री बंशीधर मंदिर, जहां विराजमान है 32 मन सोने की भगवान श्रीकृष्ण की अनोखी प्रतिमा

    AdminBy AdminJuly 8, 2026No Comments4 Mins Read
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    पलामू: जहां आस्था की बात होती है, वहां पौराणिक मान्यताएं उभर का सामने आती हैं. झारखंड के गढ़वा जिले में स्थित बंशीधर नगर का श्री बंशीधर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. यह मंदिर अपनी अद्भुत मान्यता और भगवान श्रीकृष्ण की 32 मन शुद्ध सोने से बनी दुर्लभ प्रतिमा के कारण पूरे देश में विशेष पहचान रखती है. कहा जाता है कि इतनी विशाल शुद्ध स्वर्ण प्रतिमा विश्व में भी बेहद दुर्लभ है, जो इस मंदिर को अनोखा बनाती है.
    300 साल पुराना है मंदिर
    बता दें कि मंदिर की स्थापना लगभग 300 वर्ष पहले नगर उंटारी रियासत के तत्कालीन राजा भवानी सिंह ने कराई थी. पुजारी कृष्ण पांडे ने बताया कि विक्रम संवत के 1827 को जन्माष्टमी के व्रत के दौरान रानी शिवमानी कुंवर को स्वप्न में भगवान कृष्ण आए और कनहर नदी के पास महुरिया के निकट ‘शिवपहाड़ी’ से अपनी प्रतिमा निकाल कर स्थापित करने का आदेश दिया. इसके बाद खुदाई में भगवान कृष्ण की दिव्य प्रतिमा प्राप्त हुई और उसी स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. तभी से यह मंदिर श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बन गया.
    इस मंदिर के गर्भगृह में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा बांसुरी धारण किए हुए मनमोहक स्वरूप में स्थापित है. भगवान के साथ-साथ राधा रानी की प्रतिमा भी विराजमान है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से यहां की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती है. दूर-दूर से आने वाले भक्त अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान, स्वास्थ्य और मनोकामना पूर्ति के लिए भगवान बंशीधर के चरणों में शीश झुकाते हैं.
    मंदिर में 19 सालों से पूजा कर रहे पुजारी ने बताया
    पुजारी ने आगे बताया कि वह पिछले 19 वर्षों से भगवान बंशीधर की सेवा और पूजा-अर्चना कर रहे हैं. उनके अनुसार, मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 1885 में हुई थी, जो आज से लगभग 300 वर्ष पहले की बात है. लोकमान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की 32 मन शुद्ध सोने की दिव्य प्रतिमा उत्तर प्रदेश के एक पहाड़ी क्षेत्र में भूमि के भीतर दबी हुई थी. रियासत की रानी को स्वप्न में भगवान ने दर्शन देकर अपनी प्रतिमा को वहां से निकालकर स्थापित करने का आदेश दिया. इसके बाद खुदाई में प्रतिमा प्राप्त हुई और उसे हाथी पर सवार कर नगर लाया जाने लगा. जब यात्रा के दौरान हाथी वर्तमान मंदिर स्थल पर आकर बैठ गया और आगे बढ़ने से इंकार कर दिया, तब विद्वानों और संतों ने इसे भगवान की इच्छा माना. उन्होंने कहा कि प्रभु इसी स्थान पर विराजमान होना चाहते हैं. इसके बाद यहीं भव्य मंदिर का निर्माण कर भगवान बंशीधर की प्रतिमा की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा की गई.
    जन्माष्टमी के दिन रहता है भव्य नजारा
    उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी के अवसर पर यहां का नजारा अत्यंत भव्य और आध्यात्मिक होता है. हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में जुटते हैं. पूरे मंदिर को आकर्षक फूलों और रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है. भजन-कीर्तन, रासलीला और विशेष पूजा-अर्चना से वातावरण भक्तिमय हो उठता है. इस दौरान भगवान के दिव्य दर्शन के लिए लंबी कतारें लगती हैं.
    मंदिर में लगती है श्रद्धालुओं की भीड़
    पुजारी श्री कृष्ण पांडे बताते हैं कि स्थापना काल से ही मंदिर में प्रतिदिन त्रिकाल पूजा की परंपरा चली आ रही है, जो आज भी पूरी श्रद्धा और वैदिक विधि-विधान के साथ निभाई जाती है. उनका कहना है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन और अटूट विश्वास के साथ भगवान बंशीधर के दरबार में अपनी मनोकामना लेकर आते हैं, उनकी प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है.
    जानें मंदिर और खुलने और बंद होने का समय
    साथ ही कहा कि मंदिर का पट प्रतिदिन सुबह 5 बजे खुलता है. सुबह 5 बजे से 7 बजे तक भगवान की विशेष पूजा, आरती और श्रृंगार होता है. इसके बाद सुबह 7 बजे से दोपहर 12 बजे तक श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर सकते हैं. दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक मंदिर का पट विश्राम के लिए बंद रहता है. इसके बाद दोपहर 2 बजे से रात 8 बजे तक पुनः दर्शन की व्यवस्था रहती है, जहां दूर-दूर से आने वाले हजारों श्रद्धालु भगवान बंशीधर के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.
    इस मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद मजबूत है. भगवान की स्वर्ण प्रतिमा की सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक, सीसीटीवी निगरानी और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की जाती है. इसके बावजूद मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को शांति और भक्ति का अद्भुत अनुभव कराता है.
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