झारखंड में सरकारी धन के हिसाब-किताब और वित्तीय अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य में अंकेक्षण आपत्तियों और लंबित वित्तीय मामलों की राशि घटने के बजाय लगातार बढ़ी है। वर्ष 2021-22 से 2025-26 की अवधि के दौरान यह राशि बढ़कर 18,060 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। इसमें गबन, वित्तीय दुरुपयोग, वसूली योग्य राशि, असमायोजित अग्रिम, अंकेक्षण आपत्तियां और जमा की जाने वाली राशि शामिल हैं। इतनी बड़ी राशि से जुड़े मामलों का निपटारा न होना सरकारी विभागों की वित्तीय जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
इससे पहले दर्ज थे 9,737 करोड़
इससे पहले 2001 से 2022-23 तक के लंबित मामलों में 9,737 करोड़ रुपये की राशि दर्ज थी। इस पर तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव ने 5 अक्तूबर 2023 को समीक्षा बैठक कर चिंता जताई थी और मार्च 2024 तक इसमें 50 प्रतिशत कमी लाने का लक्ष्य दिया था। साथ ही वित्तीय प्रणाली में सुधार के लिए बिहार की तर्ज पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने का निर्देश दिया था। हालांकि, निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप मामलों का निपटारा नहीं हुआ और पिछले पांच वर्षों में यह राशि बढ़कर लगभग दोगुनी हो गई।
मंत्री ने बुलाई सचिवों की बैठक
अब वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने 22 अक्तूबर को विभागीय सचिवों की बैठक बुलाई है। इससे पहले दो बार निर्धारित बैठकें नहीं हो सकी थीं। 2023 की समीक्षा बैठक में राजस्व, स्वास्थ्य, पथ निर्माण और कृषि विभाग में सबसे अधिक अनियमितताएं पाई गई थीं।
22 वर्षों का पिछला रिकॉर्ड
वर्ष 2001 से 2022-23 तक के 22 वर्षों में लंबित मामलों में 9,737 करोड़ की राशि सामने आई थी। इनमें 63.57 करोड़ गबन, 180 करोड़ के दुरुपयोग, 688 करोड़ वसूली योग्य राशि, 476 करोड़ असमायोजित अग्रिम और 8,330 करोड़ की अंकेक्षण आपत्तियां थीं।
कई विभागों में गड़बड़ियां
पांच अक्तूबर 2023 की समीक्षा में राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार, स्वास्थ्य, पथ निर्माण और कृषि विभाग में सबसे अधिक गड़बड़ियां पाई गई थीं। इसके अलावा स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, ग्रामीण विकास, नगर विकास, जल संसाधन, खान और परिवहन विभाग भी समीक्षा के दायरे में हैं। तत्कालीन वित्त मंत्री ने कहा था कि झारखंड जैसे छोटे राज्य में इतनी बड़ी राशि के व्यय पर अंकेक्षण आपत्तियां होना चिंताजनक है।

