पत्नी के रंग-रूप, स्वभाव, आईक्यू और बातचीत करने की क्षमता को लेकर पति की कथित टिप्पणियां भले ही वैवाहिक जीवन में अनुचित और आपत्तिजनक हों, लेकिन हर ऐसी टिप्पणी को भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता। झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पति के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि आरोपों में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह माना जाए कि पति का व्यवहार पत्नी को आत्महत्या के लिए मजबूर करने या उसके जीवन, शरीर अथवा मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करने वाला था।
कोर्ट ने रद्द कर दी पूरी कार्यवाही
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने निचली अदालत के समन आदेश और डिस्चार्ज आवेदन खारिज करने के आदेश समेत पूरी आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर दी। मामले के अनुसार, पति-पत्नी की शादी एक वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम से हुई थी। पत्नी ने शिकायत में आरोप लगाया था कि शादी के बाद पति उसके रंग-रूप को लेकर ताने देता था। उसके अंतर्मुखी स्वभाव पर टिप्पणी करने के साथ-साथ उसकी बौद्धिक क्षमता और बातचीत करने के तरीके को लेकर भी कथित रूप से अपमानजनक बातें कही गईं। पत्नी का यह भी आरोप था कि पति उसे अलग रहने के लिए कहता था। बाद में वह मायके चली गई और आरोप लगाया कि पति ने उसे वापस वैवाहिक जीवन में लौटने की अनुमति नहीं दी।
स्त्रीधन के मुद्दे पर पति को जारी किया गया था समन
शिकायत में स्त्रीधन का मुद्दा भी उठाया गया था। पत्नी का कहना था कि उसका स्त्रीधन पति के पास था और तलाक की कार्यवाही के दौरान उसे वापस करने की बात कही गई। लेकिन वास्तविक रूप से सामान वापस नहीं किया गया। शिकायत के बाद पत्नी और गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इसके आधार पर रांची की न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने धारा 498ए के तहत प्रथमदृष्टया मामला मानते हुए पति को समन जारी किया। पति ने आरोप से मुक्त करने के लिए डिस्चार्ज याचिका दाखिल की, लेकिन 10 अप्रैल को इसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसकी ओर से कहा गया कि शिकायत में लगाए गए आरोप 498ए की कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि हर वैवाहिक विवाद या दुर्व्यवहार को आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

