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    Home»Breaking News»Ranchi Rath Yatra 2026: आज भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा, 334 साल पुरानी परंपरा की साक्षी बनेगा रांची शहर
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    Ranchi Rath Yatra 2026: आज भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा, 334 साल पुरानी परंपरा की साक्षी बनेगा रांची शहर

    AdminBy AdminJuly 16, 2026No Comments5 Mins Read
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    रांची: 15 दिनों तक अज्ञातवास में रहने के बाद भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ बुधवार को भक्तों को दर्शन दिए. नेत्रदान अनुष्ठान के साथ राजधानी रांची के धुर्वा स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर में वार्षिक रथ यात्रा महोत्सव की विधिवत शुरुआत हो गई. मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी. “जय जगन्नाथ” के जयघोष और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान की विशेष पूजा-अर्चना की गई.

    अब आज (16 जुलाई) को भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथ पर सवार होकर मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) के लिए प्रस्थान करेंगे. इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है. राज्य के कई वीवीआईपी, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी भी रथ यात्रा में शामिल हो सकते हैं. श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचकर पुण्य लाभ अर्जित करेंगे.

    सजकर तैयार मेला परिसर

    रथ यात्रा को लेकर जगन्नाथपुर मेला पूरी तरह सज-धजकर तैयार है. मेले में बच्चों के लिए एक से बढ़कर एक झूले लगाए गए हैं. मौत का कुआं, मिस्टिक झूले, मनोरंजन के कई आकर्षण, पारंपरिक व्यंजन, मिठाइयों की दुकानें, खिलौने, घरेलू सामान, पूजा सामग्री और विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प की दुकानें लोगों को आकर्षित कर रही हैं. बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और झारखंड के विभिन्न जिलों से व्यापारी हर वर्ष की तरह इस बार भी अपनी दुकानें लेकर पहुंचे हैं. कई ऐसे परिवार हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस मेले में दुकान लगाते आ रहे हैं और इसे अपनी परंपरा का हिस्सा मानते हैं.

    334 वर्ष पुरानी परंपरा का प्रतीक है रांची की रथ यात्रा

    राजधानी रांची में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है. यह परंपरा 334 वर्षों से अधिक पुरानी है और पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के बाद देश की प्रमुख रथ यात्राओं में इसकी गणना होती है.

    ये है इतिहास

    धुर्वा की नीलांचल पहाड़ी पर स्थित जगन्नाथपुर मंदिर झारखंड की आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. वर्ष 1691 ईस्वी में नागवंशी राजा एनीनाथ शाहदेव ने इस मंदिर की स्थापना कराई थी. मंदिर का निर्माण ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर किया गया, लेकिन इसमें झारखंड की स्थानीय संस्कृति और स्थापत्य कला की स्पष्ट झलक दिखाई देती है.

    जब राजा ने तीर्थ को ही रांची ले आने का लिया निर्णय

    जगन्नाथपुर मंदिर की स्थापना के पीछे भी एक रोचक इतिहास जुड़ा है. कहा जाता है कि नागवंशी राजा एनीनाथ शाहदेव स्वयं पुरी जाकर भगवान जगन्नाथ की आराधना करना चाहते थे, लेकिन राजकीय जिम्मेदारियों के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका. तब उन्होंने संकल्प लिया कि यदि वे तीर्थ नहीं जा सकते, तो भगवान को ही अपने राज्य में स्थापित करेंगे.

    मान्यता है कि पुरी में तपस्या के दौरान भगवान जगन्नाथ ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि वे अपने राज्य लौट जाएं और वहीं उनके लिए मंदिर बनवाएं. इसके बाद धुर्वा की प्राकृतिक पहाड़ी को चुना गया, जिसे बाद में नीलांचल पर्वत कहा गया और वहीं जगन्नाथपुर मंदिर की स्थापना हुई.

    कलिंग शैली का अनुपम उदाहरण

    लाल बलुआ पत्थरों से बना यह मंदिर कलिंग स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है. गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमाएं स्थापित हैं. धार्मिक परंपरा के अनुसार निश्चित अवधि पर नवकलेवर अनुष्ठान के तहत इन विग्रहों का परिवर्तन किया जाता है.

    रथ यात्रा से पहले भगवान 15 दिनों तक अज्ञातवास में रहते हैं. इसके बाद नेत्रदान अनुष्ठान के जरिए भगवान भक्तों को दर्शन देते हैं. गुरुवार को भगवान अपने भाई-बहन के साथ रथ पर सवार होकर मौसीबाड़ी जाएंगे, जहां वे नौ दिनों तक विराजमान रहेंगे. इसके बाद बहुदा यात्रा के साथ पुनः मुख्य मंदिर लौटेंगे. धार्मिक मान्यता है कि रथ यात्रा में शामिल होने और भगवान का रथ खींचने से सौ यज्ञों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है तथा भक्तों के कष्ट दूर होते हैं.

    तीन रथों का विशेष महत्व

    रथ यात्रा में तीन रथ शामिल होते हैं. भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष, बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज और माता सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है. भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे विशाल होता है. पारंपरिक मान्यता के अनुसार रथों का निर्माण नीम की लकड़ी से किया जाता है और इन्हें रंग-बिरंगे वस्त्रों तथा फूलों से सजाया जाता है.

    लोहरा परिवार निभा रहा 334 वर्षों की परंपरा

    रथ निर्माण की जिम्मेदारी वर्षों से लोहरा परिवार निभाता आ रहा है. पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परिवार बिना किसी पारिश्रमिक के भगवान की सेवा भाव से हर वर्ष नया रथ तैयार करता है. रथ निर्माण धार्मिक अनुष्ठानों और विशेष पूजा के साथ प्रारंभ किया जाता है.

    भक्ति, संस्कृति और व्यापार का संगम है जगन्नाथपुर मेला

    रथ यात्रा के साथ लगने वाला जगन्नाथपुर मेला झारखंड के सबसे बड़े मेलों में शामिल है. यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र है. हजारों श्रद्धालुओं के साथ बड़ी संख्या में पर्यटक भी यहां पहुंचते हैं. स्थानीय कलाकारों, व्यापारियों और पारंपरिक व्यवसायों को भी इस मेले से नई पहचान और रोजगार मिलता है.

    व्यापक सुरक्षा व्यवस्था

    रथ यात्रा और मेले को लेकर जिला प्रशासन ने व्यापक तैयारी की है. पूरे मेला परिसर और रथ मार्ग पर सीसीटीवी कैमरे, वॉच टावर, अतिरिक्त पुलिस बल, ट्रैफिक व्यवस्था, स्वास्थ्य शिविर, पेयजल, बिजली और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था की गई है. विभिन्न स्वयंसेवी संगठन भी श्रद्धालुओं की सुविधा में सहयोग करेंगे.

    धरोहर के संरक्षण की जरूरत

    334 वर्ष पुराना जगन्नाथपुर मंदिर आज भी झारखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है. विशेषज्ञों और नागवंशी परिवार के सदस्यों का मानना है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित किया जाना चाहिए. साथ ही इसे धार्मिक पर्यटन सर्किट से जोड़ने और आने वाली पीढ़ियों को इसके इतिहास एवं महत्व से परिचित कराने की आवश्यकता है.

    आज भी जगन्नाथपुर मंदिर यह संदेश देता है कि आस्था, संस्कृति और सामाजिक समरसता मिलकर ऐसी विरासत का निर्माण करती हैं, जो सदियों तक लोगों को जोड़ने का कार्य करती है. गुरुवार को निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा एक बार फिर इसी सनातन परंपरा, श्रद्धा और सामाजिक एकता का साक्षी बनेगी.

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