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    Home»Breaking News»UGC की नई गाइडलाइन पर बवाल! 2026 नियमों से सामान्य वर्ग में भारी रोष
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    UGC की नई गाइडलाइन पर बवाल! 2026 नियमों से सामान्य वर्ग में भारी रोष

    AdminBy AdminJanuary 27, 2026No Comments4 Mins Read
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    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( UGC ) की जनवरी में जारी गाइडलाइन के खिलाफ देशभर के छात्रों और शिक्षाविदों के एक बड़े तबके में भारी रोष दिख रहा है। Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर सामान्य वर्ग आशंकित है। उसका कहना है कि यह गाइडलाइन निष्पक्ष नहीं और इसके जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों का उत्पीड़न हो सकता है।

    विवाद इसलिए: नए नियमों में ‘ जातिगत ‘भेदभाव’ का मतलब केवल एससी, एसटी और ओबीसी के खिलाफ भेदभाव को बताया गया है। विरोध करने वालों का कहना है कि यह परिभाषा एकतरफा है, इसमें सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव या झूठी शिकायतों का कोई जिक्र नहीं है।

    विस्तृत व्याख्या: इस मामले में चल रहे विवादों पर बात करने से पहले नए नियमों को समझना जरूरी है। इन नियमों में भेदभाव को पूरी तरह गलत और पक्षपाती व्यवहार माना गया है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ही नहीं, जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान या विकलांगता के आधार पर भेदभाव भी गलत है। नियम यह भी कहते हैं कि शिक्षा में समानता रोकने वाला या किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला हर काम अनुचित माना जाएगा।

    समानता के लिए समिति: गाइडलाइंस के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में समान अवसर केंद्र (EOC) बनाना अनिवार्य होगा। इस केंद्र का काम होगा संस्थान में बराबरी सामाजिक समावेशन और सभी को समान अवसर देना। साथ ही, कैंपस में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों का समाधान करना भी इसकी जिम्मेदारी होगी। हर संस्थान में EOC के तहत एक समता समिति बनानी होगी। इसका अध्यक्ष संस्थान का प्रमुख होगा। समिति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग और महिला का प्रतिनिधित्व जरूरी होगा।

    निष्पक्षता पर संशय: सामान्य वर्ग को आशंका है कि जिस तरह से एससी-एसटी एक्ट के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट तक टिप्पणी कर चुका है, वैसे ही UGC की गाइडलाइंस का भी दुरुपयोग हो सकता है। आलोचकों का मानना है कि समता समितियां है, शायद ही निष्पक्ष रह पाएं। उन्हें जो शक्तियां दी जा रही हैं, उनका सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है। गलत शिकायत पर सजा का प्रावधान भी नहीं है।

    सामाजिक विभाजन का डर: सामान्य वर्ग के एक बड़े तबके को लगता है कि नए नियम सुधार के बजाय शैक्षणिक परिसरों में जातिवाद को बढ़ावा देंगे और इससे सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिलेगा। इन नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर उनकी फंडिंग रोकी जा सकती है, उनका डिग्री देने का अधिकार छीना जा सकता है। और गंभीर उल्लंघन की स्थिति में मान्यता भी रद्द की जा सकती है।

    राजनीतिक फैक्टर: UGC का कहना है कि नए नियम साल 2012 के उसके भेदभाव विरोधी ढांचे की व्यवस्था को ही मजबूत करते हैं। उसका तर्क है कि उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 2019 की तुलना में 2023 में 118.4% की वृद्धि हो चुकी है। हकीकत यह भी है कि यह निर्णय हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या की 10वीं बरसी और सर्वोच्च न्यायालय के 2025 के निर्देश के बाद आया है। रोहित वेमुला केस को लेकर उस वक्त देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कैंपस का राजनीतिक तापमान बढ़ गया था। विपक्ष ने इस मामले को BJP के खिलाफ राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। तब सामान्य वर्ग के स्टूडेंट्स ने BJP का साथ दिया था।

    बढ़ता असंतोष: एससी-एसटी उत्पीड़न के कानून को चाहे जितना भी समानता लाने वाला माना जाता हो, लेकिन जिस तरह उसके फर्जी इस्तेमाल की घटनाएं बढ़ी हैं, उससे सामान्य वर्ग इसका विरोधी हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के बावजूद नौकरियों और पढ़ाई में आरक्षण की व्यवस्था को लेकर क्षोभ व असंतोष अब भी व्याप्त है। UGC के नए नियमों ने उसी असंतोष को बढ़ा दिया है।

    चुनावों पर असर: सामान्य वर्ग इस नियम के कितना खिलाफ है, इसे समझने के लिए सोशल मीडिया को देखना होगा, जहां #UGCRollback ट्रेंड करता रहा। करणी सेना सहित कुछ संगठन भी इस नियम के विरोध में उतर आए हैं। समाज के भीतर ही भीतर गुस्से की लहर है। इसका असर आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों में दिख सकता है। BJP की ओर से इस विवाद को थामने की कोशिश अभी नहीं दिख रही। हालांकि, उसके सांसद निशिकांत दुबे प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने सामान्य वर्ग के छात्रों को कोई नुकसान न होने का आश्वासन दिया है।

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