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    Home»Featured»झारखंड में PESA नियमावली अधिसूचित: अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को मिलेगी मजबूती, जानिए मूल बातें
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    झारखंड में PESA नियमावली अधिसूचित: अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को मिलेगी मजबूती, जानिए मूल बातें

    AdminBy AdminJanuary 3, 2026No Comments4 Mins Read
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    झारखंड राज्य में लंबे समय से लंबित पेसा (पंचायतें (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996) नियमावली को आखिरकार अधिसूचित कर दिया गया है। राज्य सरकार के पंचायती राज विभाग ने 2 जनवरी 2026 को इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी की, जो विभागीय सचिव के हस्ताक्षर से प्रमाणित है। यह कदम अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि इससे ग्राम सभाओं को स्थानीय संसाधनों, भूमि और विकास योजनाओं पर अधिक नियंत्रण मिलेगा।

    पेसा अधिनियम का बैकग्राउंड

    पेसा अधिनियम 1996 केंद्र सरकार द्वारा पारित किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था को विस्तार देना है। यह अधिनियम आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को विशेष अधिकार प्रदान करता है, जैसे कि खनिज संसाधनों का प्रबंधन, भूमि अधिग्रहण में सहमति, वन उत्पादों का उपयोग और स्थानीय विकास योजनाओं का नियोजन। झारखंड, जो आदिवासी बहुल राज्य है, में इस अधिनियम की मांग लंबे समय से की जा रही थी। राज्य गठन के बाद से ही विभिन्न आदिवासी संगठन और राजनीतिक दल इसकी नियमावली बनाने की मांग उठाते रहे हैं।

    दिसंबर 2025 में झारखंड कैबिनेट ने पेसा नियमावली के ड्राफ्ट को मंजूरी दी थी, जिसके बाद जनवरी 2026 में इसे अधिसूचित किया गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे आदिवासियों के लिए ‘नए साल का तोहफा’ बताया है। उन्होंने हाल ही में आदिवासियों से अपील की कि वे पेसा अधिनियम का अध्ययन करें ताकि अपनी भूमि और संसाधनों की रक्षा कर सकें।

    यह नियमावली राज्य के 15 अनुसूचित जिलों में लागू होगी, जहां आदिवासी आबादी बहुल है।

    अधिसूचना की मुख्य विशेषताएं

    अधिसूचना लगभग 20 पन्नों की है, जिसमें 17 अध्याय शामिल हैं। इनमें पेसा नियमावली के विभिन्न प्रावधानों का विस्तार से वर्णन किया गया है। प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं:

    ग्राम सभा की शक्तियां: ग्राम सभा को अब खनन, जल उपयोग, भूमि अधिग्रहण और वन उत्पादों पर निर्णय लेने का अधिकार होगा। बिना ग्राम सभा की अनुमति के कोई भी सरकारी या निजी परियोजना भूमि अधिग्रहण नहीं कर सकेगी।

    स्थानीय विकास: ग्राम सभाएं स्थानीय योजनाओं की योजना और क्रियान्वयन में सक्रिय भूमिका निभाएंगी, जिसमें बजट आवंटन और निगरानी शामिल है।

    आवेदन प्रारूप: ग्राम सभा के कामकाज को सुगम बनाने के लिए 8 पन्नों के विभिन्न आवेदन फॉर्म जारी किए गए हैं, जो विकास प्रस्तावों, शिकायतों और संसाधन प्रबंधन से संबंधित हैं।

    संरक्षण और विकास: नियमावली अनुसूचित क्षेत्रों के संरक्षण पर जोर देती है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा शामिल है।

    यह नियमावली कैबिनेट की मंजूरी के बाद उच्च न्यायालय की सुनवाई के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, जहां जनवरी 13, 2026 को अगली सुनवाई होनी है।

    आदिवासी समुदाय और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

    आदिवासी प्रतिनिधियों ने इस अधिसूचना का स्वागत किया है। आरएसएस से जुड़े वनवासी कल्याण केंद्र (VKK) ने इसे सराहनीय कदम बताया है।

    वहीं, कुछ संगठनों ने इसे राजनीतिक माइलस्टोन माना है, लेकिन संवैधानिक सवाल भी उठाए हैं।

    विपक्षी नेता रघुबर दास ने इसे ‘आदिवासियों को लॉलीपॉप’ बताया है, आरोप लगाते हुए कि नियमावली में मूल अधिकारों को कमजोर किया गया है। भाजपा अध्यक्ष ने भी सरकार पर आदिवासियों को गुमराह करने का आरोप लगाया है।

    गुण-दोष में विभेद

    विशेषज्ञों के आधार पर पेसा नियमावली के गुण और दोष निम्नानुसार रेखांकित किए जा सकते हैं:

    गुण (मेरिट्स):

    सशक्तिकरण: ग्राम सभाओं को स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण मिलने से आदिवासी समुदायों की स्वायत्तता बढ़ेगी, जो भूमि हड़पने और शोषण से बचाव करेगी।

    विकास में भागीदारी: स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने से विकास योजनाएं अधिक प्रभावी और समावेशी होंगी, जिससे गरीबी और असमानता कम होगी।

    सांस्कृतिक संरक्षण: पारंपरिक प्रथाओं और वन अधिकारों की रक्षा होगी, जो आदिवासियों की पहचान को मजबूत करेगी।

    कानूनी मजबूती: लंबे समय से लंबित मांग पूरी होने से राज्य में राजनीतिक स्थिरता और विश्वास बढ़ेगा।

    दोष (डेमेरिट्स):

    दिल्यूटेड प्रावधान: कुछ आलोचकों का मानना है कि नियमावली में मूल पेसा अधिनियम के प्रावधानों को कमजोर किया गया है, जैसे कि खनन और भूमि पर पूर्ण नियंत्रण न होना।

    क्रियान्वयन चुनौतियां: ग्राम सभाओं में जागरूकता और क्षमता की कमी से नियमों का प्रभावी अमल मुश्किल हो सकता है, जिससे भ्रष्टाचार या देरी हो सकती है।

    राजनीतिक विवाद: इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किए जाने का आरोप है, जो संवैधानिक सवाल उठाता है और अदालती हस्तक्षेप को आमंत्रित कर सकता है।

    सीमित दायरा: केवल अनुसूचित क्षेत्रों तक सीमित होने से राज्य के अन्य हिस्सों में आदिवासी मुद्दे अनसुलझे रह सकते हैं।

    निष्कर्ष

    पेसा नियमावली की अधिसूचना झारखंड के आदिवासी समुदायों के लिए एक ऐतिहासिक कदम है, जो उन्हें सशक्त बनाएगी। हालांकि, इसके सफल क्रियान्वयन के लिए जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण और निगरानी आवश्यक है। सरकार को आलोचनाओं पर ध्यान देकर संशोधन करने की जरूरत हो सकती है। यह कदम न केवल स्थानीय शासन को मजबूत करेगा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी अधिकारों की बहस को भी नई दिशा देगा।

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