झारखंड हाईकोर्ट ने छंटनी किए गए जनगणना कर्मियों को बड़ी राहत दी। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सरकार को इन कर्मियों की पेंशन के लिए अहर्ता सेवा की गणना 3 नवंबर 2004 से करने को कहा है। आइए जानते हैं झारखंड हाई कोर्ट ने क्या कहा है।
2004 में सरकार ने 602 छंटनी किए गए कर्मियों को राजस्व और भूमि सुधार विभाग के क्षेत्रीय कार्यालयों में रिक्त तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर समायोजित करने का निर्णय लिया था। कर्मियों की संविदा नियुक्ति 10 जून 1991 से 31 अगस्त 1992 तक बिहार के देवघर क्षेत्र में जनगणना संचालन के क्षेत्रीय उप निदेशक द्वारा संकलनकर्ता पद पर हुई थी।
क्या था पूरा मामला
जसीडीह के क्षेत्रीय सारणीकरण कार्यालय बंद होने के बाद 1 सितंबर 1992 से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। झारखंड सरकार ने 3 नवंबर 2004 को इन कर्मियों को रिक्त पदों पर समायोजित करने का निर्णय लिया। सरकार का तर्क था कि कर्मियों ने बाद में सरकारी पदों पर कार्यभार ग्रहण किया, इसलिए 1991-92 की संविदा सेवा पेंशन के लिए अर्हक नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने दलील स्वीकार कर ली। पर कार्यभार ग्रहण कराने में हुई देरी पर आपत्ति जताई। कुछ समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को 2007 में ही कार्यभार ग्रहण करने का आदेश मिल गया, जबकि इन्हें 2010 से 2012 के बीच कार्यभार दिया गया। इस देरी से कई कर्मचारी सेवानिवृत्ति से पहले 10 वर्ष की नियमित सेवा पूरी नहीं कर सके। कोर्ट ने कहा कि यह देरी समान परिस्थितियों वाले कर्मियों के साथ अलग व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के विपरीत है।
पदनाम पर आपराधिक समन जारी नहीं हो : कोर्ट
हाईकोर्ट ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल उसके पदनाम के आधार पर आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। आपराधिक मामले में समन जारी करते समय संबंधित व्यक्ति के नाम का स्पष्ट उल्लेख जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि कानून की नजर में किसी पद को धारण करने वाला पदनाम अपने-आप में कोई कानूनी व्यक्ति नहीं है।
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने इस टिप्पणी के साथ दो आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई और रांची के न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी की अदालत द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। मामला मेसर्स हिंदुजा लेलैंड फाइनेंस लिमिटेड से जुड़ा है। अदालत ने माना कि इस मामले में मजिस्ट्रेट ने संबंधित व्यक्तियों की पहचान उनके पद के आधार पर करते हुए समन जारी किया, जो गंभीर कानूनी त्रुटि है। ऐसी प्रक्रिया को जारी रखने से कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होने की आशंका है।

