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    Home»Breaking News»सरहुल पर्व का अनोखा रहस्य! कैसे घड़े का पानी बताता है बारिश का हाल?
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    सरहुल पर्व का अनोखा रहस्य! कैसे घड़े का पानी बताता है बारिश का हाल?

    AdminBy AdminMarch 21, 2026No Comments4 Mins Read
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    रांचीः झारखंड के आदिवासी बहुल इलाके में सूर्य और पृथ्वी के मिलन के पर्व सरहुल आदिवासी समाज की ओर से पर ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। प्रकृति पर्व सरहुल के मौके पर साल (सखुआ) वृक्ष की पूजा की जाती है। आदिवासी समाज में मान्यता है कि साल वृक्ष में सरना मां का निवास स्थान है जो गांव को प्राकृतिक आपदाओं से बचाती है।

    घड़े में पानी की स्थिति को देखकर

    सरहुल पर्व की मौके पर पाहन की ओर से सरना स्थल में पूजा की जाती है। इस दौरान मिट्टी के घड़े में पानी रखा जाता है। दूसरे दिन घड़े में पानी की स्थिति को देखकर पाहन की ओर से इस वर्ष होने वाली बारिश को लेकर भविष्यवाणी की जाती है।

    सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार पाहन मिट्टी के बर्तन लेते हैं, फिर इन मिट्टी के बर्तनों में ताजा पानी भर दिया जाता है। अगले दिन इन घड़ों को बारी-बारी से देखा जाता है। अगर पानी कम होता है तो माना जाता है कि बारिश कम होगी। वहीं घड़ों या मिट्टी के किसी अन्य बर्तन में पानी पहले जितना ही रहता है तो माना जाता है की अच्छी बारिश होगी।

    आदिवासी समाज में मछली और केकड़े को पृथ्वी का पूर्वज

    आदिवासी समाज में सरहुल पूजा करने के बाद ही लोग अपने खेतों की जुताई, फसल बोने और वन उपज एकत्र करने का काम शुरू करते हैं। वहीं आदिवासी समाज में मछली और केकड़े को पृथ्वी का पूर्वज माना जाता है एक पुरानी कहानी के अनुसार मछली और केकड़े नहीं समुद्र की गहराई से मिट्टी निकाल कर पृथ्वी बनाई थी। इसलिए सरहुल के पहले दिन की पूजा उन्हें समर्पित किया जाता है। जनजातीय परंपरा में लोग तालाब, पोखर या अन्य जलाशयों में जाकर मछली और केकड़ा पकड़ते हैं। फिर उसे घर की रसोई में लटका देते हैं। बाद में उन्हें पीसकर खेतों में डाला जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से फसल की अच्छी पैदावार होती है।

    हातमा स्थल में पूजा के बाद सिरमटोली तक भव्य शोभायात्रा

    रांची में सरहुल पर्व को लेकर अनोखी परंपरा है। रांची के हाथ में स्थित हातमा स्थल में पूजा अर्चना के बाद आदिवासी समाज के लोग शक्ति स्थल सिरम टोली पहुंचते हैं। हालांकि सरहुल पर्व को लेकर कोई निश्चित तिथि नहीं है। राज्य के विभिन्न इलाकों में अलग-अलग दिनों में भी सरहुल का पर्व मनाया जाता है।

    त्योहार के दौरान सरना स्थल में आदिवासियों समाज की ओर से सखुआ और महुआ के फूलों से पूजा की जाती है। सरना स्थल को ग्राम देवता जंगल पहाड़ और प्रकृति पूजा के साथ-साथ जनजातीय पुरुष, महिलाओं और बच्चे पारंपरिक परिधान पहनकर नृत्य करते हैं।

    महिलाओं-पुरुष और बच्चों का सामूहिक नृत्य मुख्य आकर्षण

    सरहुल पर्व की तैयारी एक सप्ताह पहले से शुरू हो जाती है। सरहुल के एक दिन पहले गांव के पाहन उपवास रखते हैं। इस दौरान सूर्योदय से पहले पुजारी दो नए घड़ों में पवित्र जल भरकर सरना स्थल पर अर्पित करते हैं। इसके बाद सखुआ के वृक्ष की पूजा की जाती है और गांव की समृद्धि के प्रार्थना की जाती है। पूजा के दौरान मां सरना, सूर्य देवता, ग्राम देवता और पूर्वजों को याद किया जाता है। पूजा के पहले सरना स्थल की अच्छी तरह से सफाई की जाती है। पूजा के दौरान कुछ स्थानों पर पारंपरिक नीति के अनुसार मुर्गी या अन्य पशु पक्षियों की बलि देने की भी परंपरा रही है।

    सरहुल पर्व के दौरान आदिवासी समुदाय के लोग रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजते-संवरते हैं। पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी मिलकर पारंपरिक नृत्य और गीत गीत प्रस्तुत करते हैं। गांव के अखड़ा में और सरहुल शोभायात्रा में सामूहिक नृत्य का आयोजन होता है, जो इस पर्व का मुख्य आकर्षण होता है। इस दौरान लोग चावल से बने पारंपरिक पर हरिया का सेवन करते हैं

    1967 से रांची में निकाली जा रही भव्य शोभायात्रा

    सरहुल के मौके पर पिछले कुछ दशकों से रांची समेत राज्य के विभिन्न जिलों में भव्य शोभा यात्रा निकाली जा रही है। सरहुल के मौके पर रांची में इस शोभा यात्रा की शुरुआत 1967 में कार्तिक उरांव के नेतृत्व में की गई थी। सबसे पहले आदिवासी जमीन की रक्षा के उद्देश्य के शोभायात्रा निकाली गई थी। इस शोभायात्रा के जरिए आदिवासी समाज के लोग अपनी संस्कृति-परंपरा और जीवन शैली को दिखाते हैं। शोभा यात्रा के माध्यम से आदिवासी समाज के लोग पूरी दुनिया को यह बताना चाहते हैं की उमंग और उल्लास का रहस्य प्रकृति में ही छिपा है।

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