रांची: झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव की आहट के साथ ही ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर दरारें उभरने लगी हैं। राज्य की दो सीटों पर होने वाले आगामी चुनाव ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। वर्तमान में सत्तारूढ़ गठबंधन के पास विधानसभा में पर्याप्त संख्या बल है, जिससे दोनों सीटों पर जीत सुनिश्चित मानी जा रही है। हालांकि, विवाद इस बात पर है कि इन सीटों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा? कांग्रेस जहां पिछले ‘त्यागों’ का हवाला देकर अपनी हिस्सेदारी मांग रही है, वहीं झामुमो सबसे बड़े दल के रूप में अपना दबदबा बनाए रखना चाहती है।
कम से कम एक सीट पर कांग्रेस की दावेदारी
कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के. राजू ने कहा कि पार्टी इस बार पीछे हटने के मूड में नहीं है। उन्होंने तर्क दिया है कि पिछले तीन चुनावों में गठबंधन को केवल एक-एक सीट मिली थी और हर बार कांग्रेस ने झामुमो का समर्थन किया। अब जबकि गठबंधन की स्थिति मजबूत है, कांग्रेस उच्च सदन में अपनी संख्या बढ़ाना चाहती है। इस मसले पर पांच राज्यों के चुनावों के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच निर्णायक बातचीत होने की उम्मीद है।
झारखंड में राज्यसभा जीत का गणित क्या है?
झारखंड में खाली हो रही दो सीटों का समीकरण काफी दिलचस्प है। इनमें से एक सीट झामुमो के दिग्गज नेता शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है, जबकि दूसरी सीट भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल समाप्त होने से खाली होगी। 81 सदस्यीय विधानसभा में गठबंधन की ताकत और सीटों के बंटवारे फॉर्मूला का फी जबर्दस्त है।
- वर्तमान में सत्ताधारी गठबंधन के पास कुल 56 विधायकों का समर्थन प्राप्त है।
- झामुमो के पास 34 विधायक हैं। कांग्रेस 16 विधायकों के साथ दूसरी बड़ी ताकत।
- RJD के 4 और वामपंथी दलों के 2 विधायक भी इस समीकरण का हिस्सा हैं।
- संख्या बल के आधार पर गठबंधन आसानी से दोनों सीटें जीत सकता है, बशर्ते आपसी सहमति बने।
JMM की रणनीति से दबाव में बड़े दल
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) 34 विधायकों के साथ सदन का सबसे बड़ा दल है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि क्षेत्रीय राजनीति में उनकी भूमिका सर्वोपरि है, इसलिए वे दोनों सीटों पर अपने ही प्रत्याशी उतारना चाहते हैं। झामुमो के रणनीतिकारों का तर्क है कि रिक्त हुई एक सीट उनके दिवंगत नेता की है, जिसे वे किसी भी हाल में छोड़ना नहीं चाहेंगे। दूसरी सीट पर भी वे अपने जनाधार को देखते हुए दावा मजबूत कर रहे हैं।
गठबंधन के भीतर बढ़ती असहजता
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस विवाद को समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो इसका असर भविष्य के चुनावों और गठबंधन की स्थिरता पर पड़ सकता है। हालांकि, कांग्रेस ने बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं, लेकिन झामुमो का अड़ियल रुख खींचतान को और बढ़ा सकता है। अब सभी की निगाहें दिल्ली में होने वाली ‘इंडिया’ गठबंधन की समन्वय बैठक पर टिकी हैं, जहां इस शक्ति प्रदर्शन का अंतिम फैसला होगा।

