झारखंड हाईकोर्ट ने पारा शिक्षकों के पेंशन अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि नियमित नियुक्ति से पहले संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर दी गई सेवा को भी पेंशन के लिए योग्य सेवा माना जाएगा. जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने पांच सेवानिवृत्त इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षकों की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को उनकी पारा शिक्षक अवधि को जोड़कर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया है. अदालत ने यह पूरी प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर पूरी करने और सेवानिवृत्ति की तिथि से भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देने का भी आदेश दिया.
पारा शिक्षक से बने नियमित शिक्षक, लेकिन पेंशन से रहे वंचित
याचिकाकर्ता माणिक चंद्र मंडल, उत्पल कुमार मुखर्जी, अब्दुल हमीद अंसारी, शिव नारायण गुप्ता और मोतीलाल टुडू पहले पारा शिक्षक के रूप में कार्यरत थे. बाद में चयन प्रक्रिया के माध्यम से वे नियमित इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त हुए. नियमित सेवा में उन्होंने लगभग नौ वर्ष या उससे अधिक समय तक काम किया और वर्ष 2025 में सेवानिवृत्त हुए. हालांकि, नियमित सेवा 10 वर्ष से कुछ महीने या कुछ दिन कम होने के कारण उन्हें पेंशन का लाभ नहीं दिया गया. उनका तर्क था कि पारा शिक्षक के रूप में 8 से 12 वर्ष तक दी गई निरंतर सेवा को भी पेंशन के लिए जोड़ा जाना चाहिए.
राज्य सरकार ने किया विरोध
राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि पारा शिक्षक के रूप में दी गई सेवा पूरी तरह संविदा आधारित थी, इसलिए उसे पेंशन योग्य सेवा नहीं माना जा सकता. सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने नियमित सरकारी सेवा में 10 वर्ष पूरे नहीं किए हैं, इसलिए वे पेंशन के पात्र नहीं हैं. सरकार ने अपने पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ पुराने फैसलों का भी हवाला दिया और कहा कि संविदा सेवा को नियमित सेवा में नहीं जोड़ा जा सकता.
हाईकोर्ट ने सरकार की दलील खारिज की
अदालत ने राज्य सरकार की दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि सरकार स्वयं नियमित शिक्षक भर्ती में 50 प्रतिशत पद पारा शिक्षकों के लिए आरक्षित करती थी और इसके लिए कम से कम दो वर्ष की निरंतर सेवा अनिवार्य शर्त थी. जब नियुक्ति के समय पारा शिक्षक की सेवा को योग्यता माना गया, तो पेंशन के समय उसी सेवा को नकारना उचित नहीं है. हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार एक आदर्श नियोक्ता होने के नाते दोहरा रवैया नहीं अपना सकती. पेंशन कोई अनुग्रह या दया नहीं, बल्कि कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है.

